Shrimad Bhagvadgita
Shrimad Bhagvadgita
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परमातà¥à¤®à¤¾ ने सचà¥à¤šà¤¿à¤¦à¤¾à¤¨à¤¨à¥à¤¦ आतà¥à¤®à¤¾ को मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ मारà¥à¤— पर अगà¥à¤°à¤¸à¤° होने के लिठà¤à¥‡à¤œà¤¾ और उसके आचरण योगà¥à¤¯ मारà¥à¤—ों का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता के माधà¥à¤¯à¤® से दिया । ‘शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता’ - अठारह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯, सात सौ शà¥à¤²à¥‹à¤•ों वाला वह गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ है, जिसमें जà¥à¤žà¤¾à¤¨, कम और à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ का अà¤à¥‚तपूरà¥à¤µ संगम है, जिसमें अवगाहन करà¥à¤® करने वाला निशà¥à¤šà¤¿à¤¤ रूप से à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤• जगतॠमें नैतिक आचरण का आदरà¥à¤¶ बनता है और पारलौकिक जगतॠके चरम लकà¥à¤·à¥à¤¯ को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करता है। à¤à¤—वानॠकृषà¥à¤£ ने मानव-जीवन ‘आतà¥à¤®à¤¾ अरे दà¥à¤°à¤·à¥à¤Ÿà¤µà¥à¤¯à¤ƒ शà¥à¤°à¥‹à¤¤à¤µà¥à¤¯à¤ƒ मनà¥à¤¤à¤µà¥à¤¯à¤ƒ निरà¥à¤¦à¤¿à¤§à¥à¤¯à¤¾à¤¸à¤¿à¤¤à¤µà¥à¤¯à¤ƒâ€™ इस अथाह जà¥à¤žà¤¾à¤¨ को अरà¥à¤œà¥à¤¨ के माधà¥à¤¯à¤® से मानव मातà¥à¤° तक पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¯à¤¾ है, वही जà¥à¤žà¤¾à¤¨ ‘शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता’ गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ में निहित है। गीता मानवों की समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं का समाधान पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करती हà¥à¤ˆ, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ उनà¥à¤¨à¤¯à¤¨ को दिशा में अगà¥à¤°à¤¸à¤° करने में सकà¥à¤·à¤® है। अशानà¥à¤¤à¤¿, पीड़ा, हा- हाकार के à¤à¤¯à¤¾à¤µà¤¹ परिवेश में शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता का महतà¥à¤¤à¥à¤µ और अधिक बढ़ गया है। इसी उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ को आतà¥à¤®à¤¸à¤¾à¤¤ करते हà¥à¤ मैंने संसà¥à¤•ृतजà¥à¤ž तथा संसà¥à¤•ृत देववाणी को न समà¤à¤¨à¥‡ वालों के लिठइस गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ को हिनà¥à¤¦à¥€ अरà¥à¤¥ तथा सरल वà¥à¤¯à¤¾à¤–à¥à¤¯à¤¾ सहित पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ किया है ‘शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता’ में निहित जà¥à¤žà¤¾à¤¨ को, इसके वरà¥à¤£à¥à¤¯ - विषय को अधà¥à¤¯à¥‡à¤¤à¤¾ समà¤à¥‡à¤‚, गà¥à¤°à¤¹à¤£ करें तथा वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° में लाये - अतः सरलतम शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ किया है। गीता के वरà¥à¤£à¥à¤¯-विषय (जà¥à¤žà¤¾à¤¨, कम, à¤à¤¤à¥à¤¤à¤¿à¤«à¤¼, हठयोग आदि) को इस पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• में सारणियों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ किया गया है। यह पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• निशà¥à¤šà¤¿à¤¤ रूप से जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पिपासà¥à¤“ं को जà¥à¤žà¤¾à¤¨-गंगा में निमणà¥à¤£à¤¿à¤¤ करती हà¥à¤ˆ, जीवन की नई ऊà¤à¤šà¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ तक पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¯à¥‡à¤—ी।
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डॉ- बीना गà¥à¤ªà¥à¤¤à¤¾ सनॠ1974 से 2013 तक संसà¥à¤•ृत अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¨ का कारà¥à¤¯ बैकà¥à¤£à¥à¤ ी देवी कनà¥à¤¯à¤¾ महाविदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ आगरा में किया । आपके निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤¨ में चौबीस छातà¥à¤°à¤“ं ने शोध कारà¥à¤¯ (Ph-D) किया । अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨, अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¨ व लेखन में आपकी विशेष रà¥à¤šà¤¿ रही है। शोध-संगोषà¥à¤ ियों मै आपने लगà¤à¤— पचास शोध-पतà¥à¤° पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ किये ! आपकी दरà¥à¤¶à¤¨ साहितà¥à¤¯ व अधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤® में विशेष रà¥à¤šà¤¿ रही है। वेदानà¥à¤¤à¤¸à¤¾à¤°, सांखà¥à¤¯à¤•ारिका, तरà¥à¤•à¤à¤¾à¤·à¤¾, चारà¥à¤µà¤¾à¤• दरà¥à¤¶à¤¨, जैन à¤à¤µà¤‚ बौदà¥à¤§ दरà¥à¤¶à¤¨ तथा सौनà¥à¤¦à¤°à¥à¤¯à¤²à¤¹à¤°à¥€ की टीकायें लिखी तथा आगरा विशà¥à¤µà¤µà¤¿à¤¦à¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ सà¥à¤¤à¤°à¥€à¤¯ पचà¥à¤šà¥€à¤¸ पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों (वà¥à¤¯à¤¾à¤•रण-अलंकार, साहितà¥à¤¯ समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¤) का समà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ किया । शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥à¤à¤—वदॠगीता, अषà¥à¤Ÿà¤¾à¤µà¤•à¥à¤° महागीता की वà¥à¤¯à¤¾à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों को लिखने का शà¥à¤°à¥‡à¤¯ à¤à¥€ आपको हैI
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